शनिवार, 25 अप्रैल 2009
कैसी लड़ाई ?
इंसान कई तरह की मजबूरियों से घिरा है। रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा,रोज़गार और सब के बीच ख़ुद के वजूद को बनाये रखने की लड़ाई।पर वजूद की लड़ाई तो तब जब कि बाक़ि ज़रूरते पूरी हों। और पहले की सभी लड़ाईयां पता नहीं कहां लील जातीं हैं इस आख़िरी युद्ध को।मन पूछता है कि क्या ये सब पाने के बाद मै, आप, हमसब अपने वजूद की तलाश करते हैं।क्या हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि हम जहां है वहां क्यों है। या फिर हमें कहां होना चाहिए। या फिर हम वहां क्यों नहीं हैं जहां होना चाहिए। मालूम नहीं ये सवाल कितने लोग अपने मन से करते हैं।जीवन तो ऐसे या वैसे कट ही जाता है। समय तो बीत ही जाता। वक्त का पहिया तो घूम ही जाता है। पर इस एक पूरे घुमाव में एक चीज़ जो बदला जाता है वो है हमारे हाथ में बचा वो जीवन जो जीवन भर हम बनाते है। बना हुआ, बिगड़ा हुआ, टेढ़ा, मेढ़ा, सजा सवंरा, बिखरा, बिगड़ा, सफल, असफ, पूरा या अधूरा। ये सभी रूप हो सकते है ज़िंदगी के जो लकीरों के रूप में हमारी हथेली मे बचे रहते है।कितने लोग हैं जो इस लड़ाई की अहमियत को समझ पाते हैं या फिर समझने का मौक़ा पाते हैं। मै तो उन सभी खुशकिस्मत समझता हूं जो अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे है। नहीं तो अपने शहरों और गांवो की सड़कों पर बैठे उन भिखारियों या कचरे बीनते उन बचपन की आंखों में एक ही लड़ाई दिखती है मुझे। बस आज का गुज़ारा भर करने की लड़ाई। अगली सुबह फिर से एक नई लड़ाई बन कर सामने खड़ी हो जाती है। हर रोज़ की लड़ाई। मन कहता है कि देश के अंदर ये भूखे नंगों की फ़ौज किसने खड़ी कर दी है। ये अभाव का समंदर किसने पैदा कर दिया है। ये रास्ते ऐसे क्यों हैं जैसे इनकी कोई मंज़िल ही न हो। क्या होता अगर मै भी इन्हीं में से एक होता। क्या होता कि मैं भी सड़क के किनारे धूल में सनी काली काया लेकर उसी क़तार में खड़ा रहता। उस क़तार में जो मंदिरों, मस्जिदों या किसी चहल-पहल वाली सड़क के किनारे लगी रहती है। जिसमें कई जोड़ी आंखे एक साथ झपट पड़ने वाली निगाह से किसी दयावान की ओर देखती है। और कोई एक फुट दूर से नाक भौं सिकोड़कर मुझे कुछ खाने को देता, या कुछ सिक्के उछाल कर अपने पुण्य के खाते में इज़ाफआ करता। क्या होता? मन सोचता है सब इतने अलग क्यों है। मन में पाप बोध सा लगता है। कुछ खाते हुए जब सामने कोई पांच या छह साल का बच्चा हाथ फैलाये खड़ा हो जाता है। मुंह में कौर जाने के बाद लगता है कि क्या कर दिया मैने? क्या खा लिया मैने? इतना अंतर क्यों है? ये कैसी लड़ाई है? दरिद्र नारायण को नरायण के दरवाजे पर भीख मांगता देख दुख लगता है। अपने जीवन के साथ दूसरों का जीवन न बदल पाने के बेबसी मन को कचोटती है। हम इतने बेबस कैसे हो गये? क्या हमारा वजूद इन लोगों से जुड़ा नहीं है? क्या इनके भूख की लड़ाई हमारी लड़ाई नहीं है?
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