शनिवार, 16 मई 2009

बड़ी धीमी है उसकी आवाज़
आहिस्ता आहिस्ता
हमसे वो कुछ कहता है
कहीं और नहीं
वो हमारे भीतर ही रहता है
हम सबके भीतर
बहुत भीतर
सोता नहीं जागता
हमारे कर्मों से आगे भागता
वो पल पल बताता है
हर पल चेताता है
राह दिखाता है
कभी सोचा है
कौन है वो
क्या रिश्ता है
क्यों वो हमारे तुम्हारे पीछे पड़ा है
हर कदम पर तन के क्यों खड़ा है
कभी कभी खीज भी होती है
क्या ऐसी भी कोई बेशर्म चीज भी होती है
कितना उसे भगाओ
पर रात के हर अंधेरे के बात
उसे नियत जगह पाओ
फिर से उसी काम मे लगा
न हारा , न थका
और जब हम ख़ुद के बनाये जाल में उलझ जाते है
तो घोर एकांत में उसे ही सच्चा साथी पाते है
कौन हैं वो जो मेर अंदर
मेरे हर पग को गलत ठहरा रहा है
कहीं और है मेरी मंजिल लगातार
फुसफुसा रहा है
मै नकारता हू
फिर नकार नहीं पाता हूं
वो क्यों नहीं समझता कि हम इंसान है
मजबूरियों के पुतले
बाहर से गहरे
अंदर से उथले
मै रोज़ ख़ुद को यक़ीन दिलाता हू
मै आम इंसान हू
वो कहता है
मै अपना भगवान हूं
कहां ले जाना चाहता है
क्या चाहता है मुझसे
दूर भाग के मैं भाग नहीं पाता हूं
मीलों तय कर उसी के पास आ जाता हूँ
मैं उस इंसान से मुक्ति चाहता हूं
मै अदना सा आदमी बनना चाहता हूं
अदना सा आदमी
जो झूठा भी है, सच्चा भी
जो बड़ा भी है
बच्चा भी
जो बुरा है तो सही
साथ ही साथ अच्छा भी
गलतियां कर पछताना चाहता हूं
मैं सोच के इस भंवर से निकल जाना चाहता हूं
फिर क्यों ये अंदर बैठा
मुझे एक दिशा में खींचने की कोशिश कर रहा है
मैं क्यों न चाह कर भी उसे सुनना चाहता हू
क्या है उसकी बताई राह पर
पग बढ़ा कर देखना चाहता हूं
मेरे अंदर बैठा वो
मुझे मुझसे ताक़तवर लगता है
मै डरता हूं
पर वो नहीं डरता है
वो बुला रहा है
किसी रास्ते पर
जो वो कहता है कि ये राह ही
मेरी राह है
वो कहता है कि
वो जो चाहता है

वही मेरी भी चाह है


शनिवार, 25 अप्रैल 2009

कैसी लड़ाई ?

इंसान कई तरह की मजबूरियों से घिरा है। रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा,रोज़गार और सब के बीच ख़ुद के वजूद को बनाये रखने की लड़ाई।पर वजूद की लड़ाई तो तब जब कि बाक़ि ज़रूरते पूरी हों। और पहले की सभी लड़ाईयां पता नहीं कहां लील जातीं हैं इस आख़िरी युद्ध को।मन पूछता है कि क्या ये सब पाने के बाद मै, आप, हमसब अपने वजूद की तलाश करते हैं।क्या हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि हम जहां है वहां क्यों है। या फिर हमें कहां होना चाहिए। या फिर हम वहां क्यों नहीं हैं जहां होना चाहिए। मालूम नहीं ये सवाल कितने लोग अपने मन से करते हैं।जीवन तो ऐसे या वैसे कट ही जाता है। समय तो बीत ही जाता। वक्त का पहिया तो घूम ही जाता है। पर इस एक पूरे घुमाव में एक चीज़ जो बदला जाता है वो है हमारे हाथ में बचा वो जीवन जो जीवन भर हम बनाते है। बना हुआ, बिगड़ा हुआ, टेढ़ा, मेढ़ा, सजा सवंरा, बिखरा, बिगड़ा, सफल, असफ, पूरा या अधूरा। ये सभी रूप हो सकते है ज़िंदगी के जो लकीरों के रूप में हमारी हथेली मे बचे रहते है।कितने लोग हैं जो इस लड़ाई की अहमियत को समझ पाते हैं या फिर समझने का मौक़ा पाते हैं। मै तो उन सभी खुशकिस्मत समझता हूं जो अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे है। नहीं तो अपने शहरों और गांवो की सड़कों पर बैठे उन भिखारियों या कचरे बीनते उन बचपन की आंखों में एक ही लड़ाई दिखती है मुझे। बस आज का गुज़ारा भर करने की लड़ाई। अगली सुबह फिर से एक नई लड़ाई बन कर सामने खड़ी हो जाती है। हर रोज़ की लड़ाई। मन कहता है कि देश के अंदर ये भूखे नंगों की फ़ौज किसने खड़ी कर दी है। ये अभाव का समंदर किसने पैदा कर दिया है। ये रास्ते ऐसे क्यों हैं जैसे इनकी कोई मंज़िल ही न हो। क्या होता अगर मै भी इन्हीं में से एक होता। क्या होता कि मैं भी सड़क के किनारे धूल में सनी काली काया लेकर उसी क़तार में खड़ा रहता। उस क़तार में जो मंदिरों, मस्जिदों या किसी चहल-पहल वाली सड़क के किनारे लगी रहती है। जिसमें कई जोड़ी आंखे एक साथ झपट पड़ने वाली निगाह से किसी दयावान की ओर देखती है। और कोई एक फुट दूर से नाक भौं सिकोड़कर मुझे कुछ खाने को देता, या कुछ सिक्के उछाल कर अपने पुण्य के खाते में इज़ाफआ करता। क्या होता? मन सोचता है सब इतने अलग क्यों है। मन में पाप बोध सा लगता है। कुछ खाते हुए जब सामने कोई पांच या छह साल का बच्चा हाथ फैलाये खड़ा हो जाता है। मुंह में कौर जाने के बाद लगता है कि क्या कर दिया मैने? क्या खा लिया मैने? इतना अंतर क्यों है? ये कैसी लड़ाई है? दरिद्र नारायण को नरायण के दरवाजे पर भीख मांगता देख दुख लगता है। अपने जीवन के साथ दूसरों का जीवन न बदल पाने के बेबसी मन को कचोटती है। हम इतने बेबस कैसे हो गये? क्या हमारा वजूद इन लोगों से जुड़ा नहीं है? क्या इनके भूख की लड़ाई हमारी लड़ाई नहीं है?

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

घर तक जाती गली......

गलियां इंसान के जीवन में क्या अहमीयत रखती हैं, ये तब पता चलता है जब एक लंबा अरसा गुज़र जाने के बाद आप उन गलियों से होकर गुज़रते हैं, जो कभी आपका रूटीन वर्क हुआ करता था। जब दिन में कई बार , बार-बार गुज़रते थे। पढ़ने बैठा था कि मां किचन से चिल्लाई' जा के पंडित जी की दुकान से चाय ले आओं......... चीनी ले आओं........आटा.....प्याज.....और न जाने क्या- क्या । ना नुकर करते, टालते मोलते निकलो भी तो पिछे से आवाज आती। कोई भी सामान भूलना मत......याद है न क्या- क्या लाना है.....तब ऐसा चगता था कि ये गलिया कितनी मोड़दार, लम्बी हैं। जल्दी खत्म ही नहीं होती। साईकिल है तो ठीक, वरना तेज क़दमों से या कभी-कभी दौड़ते हुए।घर तक जाती उन गलियों के ख़त्म होने के बाद ही सांस लेते थे। लेकिन जब आज घर जाओं तो आंखों में उन्ही घर तक जाती गलियों की तस्वीर होती है। पता नहीं क्या-क्या बदला होगा इतने दिनों में।हर बार कुछ ने कुछ बदल ही जाता है। किसी का नया मक़ान बन जाता है। कोई पुराना पेड़ जो आपके घर के आस-पास का लैंड मार्क होता है ग़ायब मिलता है तो कभी आपके पांव जिस गली के किचड़ से गंदे हो जाते थे वो गली ही पक्की हो जाती है। कुछ न कुछ ज़रूर बदल जाता है। लेकिन जब घर आख़िरी बार छूट रहा होता है और पिछे मुड़ के घर तक जाती गली की बरसों पुरानी वो तस्वीर आंखों में कैद हो जाती है वही रह जाती है। किसी फ़ोटोग्राफिक फ़िल्म पर छपी तस्वीर की तरह। वक्त बीतता चला जाता। चीज़े छूटती चली जाती हैं। लोग छूटते चले जाते हैं। लेकिन मन जब भी अकेता होता है तो वो घर तक जाती गली गहरे रंगों के साथ उभर कर आंखों के सामने चली आती है। साथ में सब कुछ आ जाता है सामने साथ में खेलते टलते दोस्त, घर के बाहर चबूतरे पर बैठ गपियाते लोग, वो लैंडमार्क वाल पेड़, वो बरसात का वो किचड़ जिससे बच कर चलते हुए घर तक पहुंचते थे हम, मां की पुकारती आवाज़, गली में दूर से आती पापा के साईकिल की घंटी की आवाज़। मन कहता है कि आज उस गली से दुबारा गुज़रू......फिर से ..बार-बार......

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

सेक्यूलर भगवान

भगवान शुरू में आये तो सेक्यूलर ही थे। फिर सभ्यताओं के बर्चस्व की लड़ाई में वो धीरे-धीरे वो नॉन-सेक्यूलर की कैटेगरी में आ गये। आज जब देश की राजनीति ने भगवानों को आगे कर वोट का प्रसाद पाने की मुहीम छेड़ रखी है, जिसमें सिर्फ़ हिंदूवादी नेता ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग के झंडाबरदार भी है, पब्लिक में भारी कनफ्यूज़न है।किस गुट में जायें? यहीं नहीं बीच में रहने वाले स्वयंभू सेक्यूलर नेता लोग भी एक अलग फ्रंट बनाये हुए हैं। इस बीच कुछ सेक्यूलर देवताओं ने अच्छी ख़ासी लोकप्रियता बटोरी है। लोग किसी रिस्क में नहीं पड़ना चाहते। कनफ्यूज़न से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे में सहारा बनते है यही सेक्यूलर भगवान। राजधानी दिल्ली में इन दिनों सबसे ज्यादा रेटिंग प्वाईंट साईं बाबा बटोर रहे हैं। यहीं हालत महाराष्ट्रा, दक्षिण भारत के राज्य और धीरे-धीरे उत्तर भारत में भी देखने को मिल रही है, जहां इन नॉन सेक्यूलर भगवानों का बोलबाला रहा है। साई बाबा के मंदिरों में जिस तरह की भीड़ और हाई प्रोफाईल मैनेजमेंट नज़र आता है, उससे उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साईं एक सेफ साईड हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल या धार्मिक संगठन ने साई पर अपना दावा नहीं ठोका है। ठोकेंगे कैसे ,जगह ही नहीं है। तो भक्तों को इससे बड़ा लाभ है। भक्ति की भक्ति और किसी का वोट बैंक बनने या कहलाने से मुक्ति। हालांकि साई के काम्पीटीशन में शनि महाराज भी है। साथ ही हैं कुछ बाबा टाईप लोग। नाम लेना सेफ़ नहीं हैं क्योंकि उनके भक्तों की संख्या भी अच्छी ख़ासी है इनक्लूडिंग नेता, अभिनेता और बाहुबलि। इसके अलवा कुछ पीर मज़ार भी हैं जो सेक्यूलर भगवानों की कैटेगरी में शामिल किये जा सकते हैं। सवाल है कि इनकी पॉपुलैरिटी इस राम के देश में जिनको भी कुछ दलों नें अपने लिए पेटेंट करा लिया है, कैसे बढ़ती जा रही है। दिल्ली के लोधी कॉलोनी के साईं टेंपल जाईये गुरूवार को। दिमाग की सारी बत्तियां खुल जायेंगी। बहरहाल एक कारण जो मेरे दिमाग में है वो ये है कि लोग पहले तो 'किस पथ जाऊं' वाले सवाल की तर्ज पर कंफ्यूज़ हुए फिर धीरे- धीरे बोर भी । लोगों को कुछ नया चाहिए था जिसमें भगवान और उनके बीच किसी का हस्तक्षेप न हो। मामला डीटीएच का था यानि डायरेक्ट टू हार्ट। बीच में कोई रूकावट के लिए खेद नहीं चाहिए था। अपने टाईप के नियम हों, अपने टाईप की पूजा। बस इस टाईप में सबसे परफ़ेक्ट नज़र आये सेक्यूलर भगवान साईं बाबा। बाबा को चढ़ने वाले प्रसादों में आप भक्तों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति देख सकते हैं आप। अभी तो साईं की भक्ति अपने चरम पर है। डर इस बात का है बढ़ती भक्तों की संख्या और दान उन्हे किसी कैटेगरी में न डाल दे। किसी दल नें अगर उन्हे पेटेंटे करने का दावा ठोका तो जनता कहां जायेगी। किसी और सेक्यूलर भगवान की तलाश में ।

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मेरी तुम्हारी डेहरी

है तो ...दिखती भी है॥फिर भी मन नहीं मानता कि कोई डेहरी है। परिवारों में , संबंधों में, रिश्तों में, रोने में, हसनें में, सबमें एक डेहरी।मन हुआ की लांघे लेकिन पांव भी उसी डेहरी के मोह में पड़ा है। सोचता है है कि उस पार न जाने क्या होगा। हर मन अपनी डेहरी के पास बैठा सोच रहा उस पार की दुनिया के बारे में..