शनिवार, 11 अप्रैल 2009
मेरी तुम्हारी डेहरी
है तो ...दिखती भी है॥फिर भी मन नहीं मानता कि कोई डेहरी है। परिवारों में , संबंधों में, रिश्तों में, रोने में, हसनें में, सबमें एक डेहरी।मन हुआ की लांघे लेकिन पांव भी उसी डेहरी के मोह में पड़ा है। सोचता है है कि उस पार न जाने क्या होगा। हर मन अपनी डेहरी के पास बैठा सोच रहा उस पार की दुनिया के बारे में..
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