शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
घर तक जाती गली......
गलियां इंसान के जीवन में क्या अहमीयत रखती हैं, ये तब पता चलता है जब एक लंबा अरसा गुज़र जाने के बाद आप उन गलियों से होकर गुज़रते हैं, जो कभी आपका रूटीन वर्क हुआ करता था। जब दिन में कई बार , बार-बार गुज़रते थे। पढ़ने बैठा था कि मां किचन से चिल्लाई' जा के पंडित जी की दुकान से चाय ले आओं......... चीनी ले आओं........आटा.....प्याज.....और न जाने क्या- क्या । ना नुकर करते, टालते मोलते निकलो भी तो पिछे से आवाज आती। कोई भी सामान भूलना मत......याद है न क्या- क्या लाना है.....तब ऐसा चगता था कि ये गलिया कितनी मोड़दार, लम्बी हैं। जल्दी खत्म ही नहीं होती। साईकिल है तो ठीक, वरना तेज क़दमों से या कभी-कभी दौड़ते हुए।घर तक जाती उन गलियों के ख़त्म होने के बाद ही सांस लेते थे। लेकिन जब आज घर जाओं तो आंखों में उन्ही घर तक जाती गलियों की तस्वीर होती है। पता नहीं क्या-क्या बदला होगा इतने दिनों में।हर बार कुछ ने कुछ बदल ही जाता है। किसी का नया मक़ान बन जाता है। कोई पुराना पेड़ जो आपके घर के आस-पास का लैंड मार्क होता है ग़ायब मिलता है तो कभी आपके पांव जिस गली के किचड़ से गंदे हो जाते थे वो गली ही पक्की हो जाती है। कुछ न कुछ ज़रूर बदल जाता है। लेकिन जब घर आख़िरी बार छूट रहा होता है और पिछे मुड़ के घर तक जाती गली की बरसों पुरानी वो तस्वीर आंखों में कैद हो जाती है वही रह जाती है। किसी फ़ोटोग्राफिक फ़िल्म पर छपी तस्वीर की तरह। वक्त बीतता चला जाता। चीज़े छूटती चली जाती हैं। लोग छूटते चले जाते हैं। लेकिन मन जब भी अकेता होता है तो वो घर तक जाती गली गहरे रंगों के साथ उभर कर आंखों के सामने चली आती है। साथ में सब कुछ आ जाता है सामने साथ में खेलते टलते दोस्त, घर के बाहर चबूतरे पर बैठ गपियाते लोग, वो लैंडमार्क वाल पेड़, वो बरसात का वो किचड़ जिससे बच कर चलते हुए घर तक पहुंचते थे हम, मां की पुकारती आवाज़, गली में दूर से आती पापा के साईकिल की घंटी की आवाज़। मन कहता है कि आज उस गली से दुबारा गुज़रू......फिर से ..बार-बार......
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बहुत अच्छी...और दिल को छूने वाली....
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