बड़ी धीमी है उसकी आवाज़
आहिस्ता आहिस्ता
हमसे वो कुछ कहता है
कहीं और नहीं
वो हमारे भीतर ही रहता है
हम सबके भीतर
बहुत भीतर
सोता नहीं जागता
हमारे कर्मों से आगे भागता
वो पल पल बताता है
हर पल चेताता है
राह दिखाता है
कभी सोचा है
कौन है वो
क्या रिश्ता है
क्यों वो हमारे तुम्हारे पीछे पड़ा है
हर कदम पर तन के क्यों खड़ा है
कभी कभी खीज भी होती है
क्या ऐसी भी कोई बेशर्म चीज भी होती है
कितना उसे भगाओ
पर रात के हर अंधेरे के बात
उसे नियत जगह पाओ
फिर से उसी काम मे लगा
न हारा , न थका
और जब हम ख़ुद के बनाये जाल में उलझ जाते है
तो घोर एकांत में उसे ही सच्चा साथी पाते है
कौन हैं वो जो मेर अंदर
मेरे हर पग को गलत ठहरा रहा है
कहीं और है मेरी मंजिल लगातार
फुसफुसा रहा है
मै नकारता हू
फिर नकार नहीं पाता हूं
वो क्यों नहीं समझता कि हम इंसान है
मजबूरियों के पुतले
बाहर से गहरे
अंदर से उथले
मै रोज़ ख़ुद को यक़ीन दिलाता हू
मै आम इंसान हू
वो कहता है
मै अपना भगवान हूं
कहां ले जाना चाहता है
क्या चाहता है मुझसे
दूर भाग के मैं भाग नहीं पाता हूं
मीलों तय कर उसी के पास आ जाता हूँ
मैं उस इंसान से मुक्ति चाहता हूं
मै अदना सा आदमी बनना चाहता हूं
अदना सा आदमी
जो झूठा भी है, सच्चा भी
जो बड़ा भी है
बच्चा भी
जो बुरा है तो सही
साथ ही साथ अच्छा भी
गलतियां कर पछताना चाहता हूं
मैं सोच के इस भंवर से निकल जाना चाहता हूं
फिर क्यों ये अंदर बैठा
मुझे एक दिशा में खींचने की कोशिश कर रहा है
मैं क्यों न चाह कर भी उसे सुनना चाहता हू
क्या है उसकी बताई राह पर
पग बढ़ा कर देखना चाहता हूं
मेरे अंदर बैठा वो
मुझे मुझसे ताक़तवर लगता है
मै डरता हूं
पर वो नहीं डरता है
वो बुला रहा है
किसी रास्ते पर
जो वो कहता है कि ये राह ही
मेरी राह है
वो कहता है कि
वो जो चाहता है
वही मेरी भी चाह है
शनिवार, 16 मई 2009
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